संसार के आरम्भ से ही हम परमात्मा का चिंतन करते आये हैं. जन्म से ही हमें एक ईश है उसके विषय में ज्ञान कराया जाता है. बाल्यावस्था से लेकर इस आयु तक सदैव हम एक शक्ति का आभास करते हैं जो हमें ही नहीं इस संपूर्ण स्रष्टि को संचालित कर रही है. क्या है वह शक्ति ? अगर ईशवर है तोह हमसे संवाद क्यों नहीं करता है ? इतने सारे प्रश्न मन में आते हैं जिनका कही भी सटीक उत्तर नहीं मिलता है. कुछ शैव हैं, तोह कुछ लिंगायत, कोई शाक्य तोह कोई राधा स्वामी को मानता है, इतनी शाखाएं हैं परम तत्त्व की के यह एक दुर्लभ सा कार्य हो जाता है के किसे भजे और किसको नहीं.
ईश्वर देखने में कैसा है , यह कोई नहीं जानता जिन तस्वीरो और मूर्तियों में हम उसके स्वरुप को तलाशते हैं वे तो राजा रवि वर्मा की कला का एक अदभुद स्वरुप हैं, निश्चय ही परमात्मा ने स्वयं खड़े होकर वह नहीं बनाया होगा. दितीय सभी देवी देवता का दक्षिण भारतीय ही हैं जो वहां के पहनावे में ही द्रष्टिगोचर होते हैं...... उत्तर सरल है , सब राजा रवि वर्मा की कृतिया हैं और जैसे उनके मन के ईश थे वैसी नज़र आई. किन्तु प्रश्न यही समाप्त नहीं होता ईश्वर क्या है ? प्रश्न अभी भी वही पर खडा है.
मगर क्या यह इतना सरल है, जिस पहेली को सुलझाने में बड़े बड़े जपी हारे क्या मै समझ सकूंगी. शायद इसकी आवश्यकता ही नहीं. मेरे लिए परमत्मा परम शक्ति हर जगह मौजूद है, ऐसा कुछ नहीं जो उस परमात्मा से जुदा नहीं है. अगर पुष्प एक भीनी सुगंध देते हैं तोह देखो कितना बड़ा चमत्कार है के हर समय खुली पवन में रह कर भी इसनकी सुगंध सर्वथा बनी रहती है. धीमी पवन की नमी में वोह खुदा है वर्ना क्या हवा में भी पानी अपने अस्तित्व का आभास देता है कभी , जल का सपर्श कितना सौम्य है, हर कोई उसके निर्मलता में खो जाता है, जब प्यास की तृप्ति के लिए इतना कुछ है फिर भी हम जल से ही तृप्त हो ते हैं क्यों ? इनके रचनाकार का कोंन है ? यह ईश्वर का आभास है....वही तोह है, सूर्य हर ऋतू में सदैव रहता है अपने गुणों क साथ चन्द्र कभी थकता नहीं क्युकि ईश है, भगवान् है, अल्लाह है......साईं हैं.....उस परमात्मा को शत शत नमन !
ईश्वर देखने में कैसा है , यह कोई नहीं जानता जिन तस्वीरो और मूर्तियों में हम उसके स्वरुप को तलाशते हैं वे तो राजा रवि वर्मा की कला का एक अदभुद स्वरुप हैं, निश्चय ही परमात्मा ने स्वयं खड़े होकर वह नहीं बनाया होगा. दितीय सभी देवी देवता का दक्षिण भारतीय ही हैं जो वहां के पहनावे में ही द्रष्टिगोचर होते हैं...... उत्तर सरल है , सब राजा रवि वर्मा की कृतिया हैं और जैसे उनके मन के ईश थे वैसी नज़र आई. किन्तु प्रश्न यही समाप्त नहीं होता ईश्वर क्या है ? प्रश्न अभी भी वही पर खडा है.
मगर क्या यह इतना सरल है, जिस पहेली को सुलझाने में बड़े बड़े जपी हारे क्या मै समझ सकूंगी. शायद इसकी आवश्यकता ही नहीं. मेरे लिए परमत्मा परम शक्ति हर जगह मौजूद है, ऐसा कुछ नहीं जो उस परमात्मा से जुदा नहीं है. अगर पुष्प एक भीनी सुगंध देते हैं तोह देखो कितना बड़ा चमत्कार है के हर समय खुली पवन में रह कर भी इसनकी सुगंध सर्वथा बनी रहती है. धीमी पवन की नमी में वोह खुदा है वर्ना क्या हवा में भी पानी अपने अस्तित्व का आभास देता है कभी , जल का सपर्श कितना सौम्य है, हर कोई उसके निर्मलता में खो जाता है, जब प्यास की तृप्ति के लिए इतना कुछ है फिर भी हम जल से ही तृप्त हो ते हैं क्यों ? इनके रचनाकार का कोंन है ? यह ईश्वर का आभास है....वही तोह है, सूर्य हर ऋतू में सदैव रहता है अपने गुणों क साथ चन्द्र कभी थकता नहीं क्युकि ईश है, भगवान् है, अल्लाह है......साईं हैं.....उस परमात्मा को शत शत नमन !

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