कृष्ण भावनामृत को सर्वपराधानता के विषय में बहुत कुछ सुना जाता है आखिर यह है क्या ? इसका तात्पर्य है कृष्ण से अटूट प्रेम और श्रद्धा बस उसी की चाह और कुछ नहीं. इस्सी लिए कृष्ण क भक्त निर्धन और दरिद्र पाए जाते हैं! कृष्ण के उपासक क्यों अन्य देवो के उपासको की भांति धनी नहीं होते ? क्यों वे भौतिक सुखो से वंचित होते हैं? ऐसे अनेको अनेक प्रश्न हमारे समक्ष आते हैं महान भक्त और विद्वानों के द्वारा इसका यह समाधान दिया गया है के , कृष्ण जो की स्वयं लक्ष्मी पति हैं जो की स्वयं सभी मायाओं के स्वामी हैं उनके ही भक्त ऐसे हाल में क्यों ? इसका कारण मात्र है उनका अपने भक्त के प्रति स्नेह, कृष्ण अपने भक्तो को निर्धन बनाकर उनको सांसारिक माया और मोह के बन्धनों से मुक्त कर देते हैं जिससे की भक्त निश्छल मन और शुद्ध भाव से स्वयं को अपनी दसो इन्द्रियों के बंधन से मुक्त होकर श्री कृष्ण में स्वयं को समा दे. जैसे के मीरा बाई, इनके शुद्ध भाव ने और निर्मल प्रेम ने कृष्ण और इनके मध्य उपस्थित समस्त भेद मिटा दिए यही वह भाव है जिसको कृष्ण अपने उपासको के ह्रदय में प्रजवलित करना चाहते हैं! भक्त के समक्ष इस कलिकाल के समस्त मायावी स्वरुप प्रकट हो जाएँ ,उसका इन सब से मोहभंग हो और अपने ईश से उसकी कामना करे जो स्वयं परमेश्वर श्री कृष्ण देना चाहते हैं, और इस अथक संतोष और तपस्या का प्रतिफल है ब्रह्मा , जिसका अनुभव मनुष्य को सीधे ही बैकुंठ धाम में श्री चरणों में ले जाता है!

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