श्री कृष्ण ने गीता में कहा है के वही एक संपूर्ण पुरुष हैं बाकि सभी मात्र आत्माएं हैं ...येह कुछ सीमाओं तक उचित प्रतीत होता है, इसका वैज्ञानिक साक्ष्य येह है के गरभास्थ शिशु अपनी प्राम्भिक अवस्था में बालिका ही होता है अर्थात स्त्री लिंग होता है, १४ सप्ताह बाद येह निर्धारित होता है के उसका सही अस्तित्व क्या है , स्त्री या पुरुष..नर या मादा!
अतः स्पष्ट है के हम सभी उस इष्ट के अधीन हैं वही निर्माता है और उसी के साथ संयोग हमारी पूर्णता है. जैसे की कोई स्त्री या पुरुष कितने अधूरे हैं अगर वोह एकल हैं यदि वेह अलग हैं , उसनका मिलन ही इस स्रष्टि की पूर्णता है. ठीक वैसे ही मनुष्य के अस्तित्वा की पूर्णता परमात्मा से एक होकर ही होती है, सबके माध्यम अलग हैं किन्तु सभी एक राह के पथिक है उस ईश्वर के. उसी की लालसा हमें सदैव आकर्षित करती है.
आर्यसमाजी हवन में और सनातन धर्मी अन्यत्र कर्म कांड में उस एक ईश्वर को प्रसन्न करने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं किन्तु क्या इस स्रष्टि का निर्माता जिसके दिए जीवन और इस संसार में हम श्वास लेते हैं! क्या वोह इस का मोह रखता है. जिसकी बने यह प्रकृति ....यह आकाश.........यह धरा ...यह सब कुछ उस परमात्मा का ही तोह है. हम क्यों इस जीवन यात्रा का एक अंग हैं. क्युकि शायद वह परमात्मा अपनी सबसे सुन्दर रचना को देख कर परखकर अपने में समामेलन करना चाहता है. मनुष्य का जनम एक यात्रा सा है और इसका अंत है उस परम पिता या परम प्रिय परमात्मा में विलीन हो जाना !
ॐ साईं राम .
अतः स्पष्ट है के हम सभी उस इष्ट के अधीन हैं वही निर्माता है और उसी के साथ संयोग हमारी पूर्णता है. जैसे की कोई स्त्री या पुरुष कितने अधूरे हैं अगर वोह एकल हैं यदि वेह अलग हैं , उसनका मिलन ही इस स्रष्टि की पूर्णता है. ठीक वैसे ही मनुष्य के अस्तित्वा की पूर्णता परमात्मा से एक होकर ही होती है, सबके माध्यम अलग हैं किन्तु सभी एक राह के पथिक है उस ईश्वर के. उसी की लालसा हमें सदैव आकर्षित करती है.
आर्यसमाजी हवन में और सनातन धर्मी अन्यत्र कर्म कांड में उस एक ईश्वर को प्रसन्न करने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं किन्तु क्या इस स्रष्टि का निर्माता जिसके दिए जीवन और इस संसार में हम श्वास लेते हैं! क्या वोह इस का मोह रखता है. जिसकी बने यह प्रकृति ....यह आकाश.........यह धरा ...यह सब कुछ उस परमात्मा का ही तोह है. हम क्यों इस जीवन यात्रा का एक अंग हैं. क्युकि शायद वह परमात्मा अपनी सबसे सुन्दर रचना को देख कर परखकर अपने में समामेलन करना चाहता है. मनुष्य का जनम एक यात्रा सा है और इसका अंत है उस परम पिता या परम प्रिय परमात्मा में विलीन हो जाना !
ॐ साईं राम .

Gud one
ReplyDeletewell written